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मै अपने बारे में बताऊँ तो लिखने का पहले शौक था जो कि अब अनिवार्यता बन गया है| पहले "लिखा हुआ" छुपा के रखती थी| अब सबको पढ़ाना चाहती हूँ साथ ही सबके विचार भी जानना चाहती हूँ| धन्यवाद !आप दैवयोग या सोची समझी नीति से आये है| आ ही गये है तो स्वागत है आपका| जिस रचना को पढ़ा है उस पर अगर अपनी छाप छोड़ देंगे तो आपका आना भी सार्थक है और मेरा "लिखा-हुआ" भी! साभार वेदिका

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2 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत बढ़िया!
इस चित्र का किसी रचना में उपयोग करने की अनुमति चाहता हूँ!

गीतिका 'वेदिका' said...

अवश्य आदरणीय रूपचंद्र शास्त्री जी!

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